92 करोड़ की ड्रग्स के साथ सेल ने पांच को किया गिरफ्तार

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अनुुभव यादव। अफीम, गांजा, डोडा, स्मैक, ब्राउन शुगर और हेरोइन कहने को ये सब अलग नाम हैं, लेकिन ये सब एक ही नशीला पदार्थ होता है। आज ये वो नाम है, जिसने पूरे फ़िल्म जगत में तहलका मचा रखा है। छोटे से लेकर बड़े कलाकारों तक कोई भी इससे अछूता नहीं है। दिल्ली पुलिस ने भी इस बार करोड़ों रुपयों की ड्रग्स पकड़ी है, आइये बताते हैं ये ड्रग्स होता क्या है और आता कहां से है और साथ ही ये शरीर में जाकर किस हद तक नुकसान करता है, आइये डालते हैं एक नजर…

स्पेशल सेल के डीसीपी प्रमोद सिंह कुशवाह ने बताया कि स्पेशल सेल के एसीपी अतर सिंह की टीम के इंस्पेक्टर शिव कुमार व कर्मवीर सिंह पिछले कईं सालों से ड्रग्स की खरीद फिरौत करने वालों के पीछे लगे हुए थे। कुछ दिन पहले ही उन्हें एक गुप्त सूचना मिली कि 8 सितंबर को एक गिरोह ड्रग्स की बड़ी खेप लेकर दिल्ली में सप्लाई करने आएगा। इस जानकारी के बाद इंस्पेक्टर शिव कुमार व कर्मवीर ने अपनी टीम तैयार की और बुराड़ी स्थित मुकंदपुर चौक पर ट्रेप लगा दिया। टीम ने कुछ देर बाद देखा कि वहां एक असम नम्बर की स्विफ्ट कार आकर रुकी है। जिसमें तीन लोग सवार थे, उसमें से एक शख्स हाथ में बैग लेकर गाड़ी से बाहर निकला और किसी का इंतजार करने लगा, कुछ देर इंतजार करने के बाद भी जब वहां कोई नहीं पहुंचा तो वह वापिस अपनी गाड़ी में बैठने लगा। यह सब देखते हुए सेल की टीम ने उस शख्स को गाड़ी में बैठने से पहले ही पकड़ लिया और हाथ से बैग छीन लिया। यह देखकर गाड़ी में बैठे उसके दो साथी दरवाजा खोलकर भागने लगे, लेकिन टीम ने दूसरी तरफ से उन दोनों को भी पकड़ लिया और उनके बैगों की तलाशी ली गई, जिसमें करीब 15 किलोग्राम अच्छी क्वालिटी की हेरोइन मौजूद थी। फिर सेल की टीम ने उस गाड़ी की तलाशी ली, जहां उन लोगों ने गाड़ी की कैविटी में भी हेरोइन के पैकेट छिपा रखे थे, वो करीब 5 किलोग्राम थी। इस तरह सेल की टीम ने उन तीनों से करीब 20 किलोग्राम हेरोइन बरामद कर ली।

Insp shiv kr.

पूछताछ के दौरान तीनों की पहचान छपरा, बिहार निवासी उदय, बेगूसराय निवासी सुबोध दास व बेगूसराय निवासी संजीव के रूप में हुई है। बताया गया है कि ये तीनों पिछले करीब चार, पांच सालों से यही काम कर रहे थे और अभी तक पुलिस से बचते आ रहे थे। पूछताछ के दौरान इन सभी ने बताया कि वे लोग यह हेरोइन बोकाजान निवासी नित्यानंद से लेते हैं और फिर यहीं से यह ड्रग्स पूरे देशभर में सप्लाई होती है। आपको बता दें कि बोकाजान असम राज्य में पड़ने वाले एक शहर का नाम है, जो सीमेंट के कारोबार के लिए बहुत मशहूर है। इन तीनों ने पूछताछ में यह बताया कि जब हम ड्रग्स की सप्लाई के लिए दिल्ली जा रहे थे, तब नित्यानन्द भी वैगनआर कार से उनके साथ ही निकला था, लेकिन वह रास्ते में रुक गया और ड्रग्स की सप्लाई के लिए लखनऊ चला गया। अब वह वहां से पैमेंट लेकर शायद दिल्ली नहीं तो किसी दूसरी जगह जाएगा। सेल की टीम ने इस जानकारी के बाद अगले ही दिन योजना बनाई और नित्यानन्द के दिल्ली आने का इंतजार किया गया। सेल की टीम को उसकी लोकेशन से पता चला कि वह दिल्ली के प्रगति मैदान की तरफ आ रहा है। तुरंत ही टीम तैयार की गई और ट्रेप लगाकर सब दूर खड़े हो गए। जैसे ही नित्यानन्द वहां असम नम्बर की वैगनआर कार से वहां पहुंचा, तभी उन तीनों ने सेल की टीम को इशारा किया और टीम ने उसे व उसके साथी राहुल को पकड़ लिया। इन दोनों के पास से भी तीन किलोग्राम हेरोइन बरामद की गई है। दोनों ने पूछताछ में बताया कि वे बाकी की हेरोइन लखनऊ व अन्य जगहों पर बेच कर दिल्ली आए थे। इस तरह पुलिस ने 5 नशे के सौदागरों को पकड़कर उनके पास से 23 किलोग्राम ड्रग्स बरामद कर ली। पुलिस के मुताबिक बरामद हेरोइन की कीमत अंतराष्ट्रीय बाजार में 92 करोड़ रुपए आंकी गई है। आगे की कार्यवाही अभी भी जारी है।

Insp karmvir singh

पूछताछ के दौरान पांचों ने सेल की टीम को बताया कि उन्हें साल में कम से कम एक बार अपने सभी ड्रग्स लेने वालों से मिलना होता है। वे सभी जगह जाकर माल की खपत के बारे में बात करते हैं और लेन देन का सारा हिसाब भी करते हैं। यही वजह रही कि ये सभी लोग मणिपुर से देशभर के लिए निकले। इन सभी ने सोचा था कि इस बार खुद यह खेप सबको पहुंचा भी देंगे और हिसाब भी कर लेंगे। हालांकि ये सभी स्पेशल सेल की रडार पर पहले से ही थे, लेकिन अपने बिल में छिपे रहने की वजह से पकड़े नहीं जा रहे थे। सेल की टीम को जैसे ही इनके बाहर निकलने की सूचना मिली, तभी सब दबोच लिए गए। पूछताछ में पता चला है कि ये लोग अपना अधिकतर काम मणिपुर, असम व वहीं के आसपास के इलाकों में ही करते हैं, इसी वजह से कभी पकड़े नहीं जाते। हालांकि इस बार ये लोग दिल्ली आते ही पकड़े गए।

All accused

क्या होती है हेरोइन
नशा करने वाले ये जितने भी नाम हैं, सभी अफीम से ही निकले हैं। कईं देशों में अफीम की खेती को कानूनन वैध माना जाता है और इतना ही नहीं भारत में तो अफीम की खेती के लिए सरकार किसानों को बाकायदा पैसा लेकर लाइसेंस भी देती है। आपको बता दें कि इसी अफीम से केमिकल डालकर हेरोइन, ड्रग्स, कोकीन और इस जैसे जितने भी नशीले पदार्थ हैं वो बनाए जाते हैं। अफीम खुद भी अपने आप में बहुत बड़ा नशा माना जाता है। अफीम की खेती का इतिहास आज का नहीं, बल्कि 6 हजार साल पुराना बताया जाता है। शुरुआत में लोगों को इसकी सही जानकारी नहीं थी, लेकिन लोग ज्यादा दर्द होने पर इसका उपयोग करते थे। बताया जाता है कि अमेरिकन सिविल वॉर में जब हजारों सैनिक दर्द से परेशान थे, तब इसी अफीम को मार्फिया के रूप में उन्हें दिया गया। उन्हें दर्द से राहत तो मिल गई, लेकिन बाद में उन्हें इस नशे की लत लग गई। सन 1925 में जेनेवा में एक शोध किया गया, तब जाकर पता चला कि अफीम बेहद खतरनाक नशा है, जो धीरे धीरे इंसान को मार डालता है। उसी वर्ष अफीम को खतरनाक नशा मानते हुए इस पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि इसकी खेती तब भी होती थी और अब भी होती है। बताया जाता है कि पूरी दुनिया में 1.7 फीसदी लोग इस नशे की चपेट में हैं।

यह नशा शरीर में कैसे काम करता है
जानकार बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अफीम या इससे बनने वाले किसी भी तरह के नशे को लेता है तो शुरुआत में उसके शरीर का दर्द, जुखाम, डिप्रेशन, नींद न आना, भूख न लगना इतियादी कईं चीजों को ठीक कर देता है, लेकिन यह दवाई के तौर पर लेते लेते, इंसान इसका सेवन भारी मात्रा में करने लगता है, क्योंकि इस नशे को शरीर का सिस्टम हर वक्त अपने शरीर में चाहता है। इसी वजह से इसकी लत लगनी तय मानी जाती है। बताया जाता है कि यह नशा खून के जरिए जल्दी दिमाग व अन्य जगहों पर चला जाता है। इसकी लत लगने पर दिमाग का ढांचा पूरी तरह से बिगड़ जाता है, जो दोबारा सही नहीं हो पाता। इसकी लत के बाद भूख नहीं लगती, नींद नहीं आती और हर समय घबराहट रहती है, इंसान डिप्रेशन में चला जाता है। इसके साथ ही इंसान के सोचने समझने की शक्ति भी लगभग खत्म हो जाती है। इसके ज्यादा सेवन से सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। इंसान कोमा में जा सकता है, उसे ब्रेन हैमरेज हो सकता है और भी कईं जानलेवा बीमारियां हो जाती हैं। इसके अलावा ड्रग्स को स्नोट करने से नोजल डैमेज हो जाती है और इंजेक्ट करने से इंफेक्शन हो जाता है।

कहां से आता है यह ड्रग्स
स्पेशल सेल ने जिस फाइन क्वालिटी की मिट्टी रंग की ड्रग्स को पकड़ा है, वह ड्रग्स म्यंमार(बर्मा) के रास्ते मणिपुर व असम होते हुए पूरे नॉर्थ इंडिया में सप्लाई की जाती थी। बर्मा से इसे लोग कईं वर्षों से मसालों के ट्रकों में भरकर चोरी छिपे मणिपुर तक ले आते हैं और फिर यहां इसमें केमिकल डालकर इसकी अलग-अलग किस्म बनाई जाती है। जिसे कोई ब्राउन शुगर कहता है तो कोई हेरोइन और कोकीन का नाम देकर ऊंचे दामों पर बेचता है। हालांकि यह सब बनता अफीम से ही है, बस उसमें अलग-अलग चीजें मिलाकर काला, भूरा, सफेद व मिट्टी रंग बना दिया जाता है। हालांकि हरे रंग के डोडा में चीरा लगाकर निकले दूध, जिसे अफीम कहते हैं उसका नेचुरल रंग हल्का भूरा होता है, जिसे किसान काला सोना कहते हैं। इसके साथ ही ड्रग्स की खेती मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में सरकार के लाइसेंस के बाद होती है। पंजाब में अफीम की खेती को खतरनाक नशा बताकर वर्ष 1955 में ही बैन कर दिया था।

हालांकि जिन राज्यों में सरकार ने इस खेती की इजाजत नहीं दी है, वहां भी लोग चोरी छिपे इसकी खेती करते हैं और इसे हेरोइन व कोकीन बनाकर महंगे दामों में बेच देते हैं। इस जानकारी के बाद आप खुद सोचिए कि इस नशीले पदार्थ को विदेश से खरीदने की क्या जरूरत, जबकि यह ड्रग्स तो अपने देश में ही भारी मात्रा में उत्पादित होता है। हालांकि पकड़े जाने पर इसके सप्लायर पुलिस व नारकोटिक्स ब्यूरो को ग़ुमराह करते हैं और इसे विदेश से लाया हुआ माल बताते हैं, जबकि कईं बार पकड़े जाने वाले इन बदमाशों ने बताया है कि अफीम को अलग-अलग नशीले पदार्थ में हम खुद ही केमिकल के जरिए तब्दील करते हैं। हालांकि इन नशे के सौदागरों के प्रति कानून बेहद कड़ा है। 500 ग्राम से ज्यादा मात्रा में पकड़े जाने वाली ड्रग्स कमर्शियल यूज के लिए मानी जाती है और इससे ज्यादा मात्रा में ड्रग्स के साथ पकड़े जाने वाले आरोपी की लगभग 10 साल तक तो जमानत भी नहीं होती। यह सब जानते हुए भी लोग न सिर्फ इसका सेवन करते हैं, बल्कि इसकी सप्लाई भी करते हैं।

स्पेशल सेल की टीम
डीसीपी पी एस कुशवाह, एसीपी अतर सिंह, इंस्पेक्टर शिव कुमार, इंस्पेक्टर कर्मवीर सिंह, एसआई पवन, राजेश शर्मा, सुमित कादयान, हरद्वारी लाल, एएसआई नरेश, हरिश्चन्द्र, हवलदार पंकज व नीरज तेवतिया

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